ईश्वर की खोज | Ishwar ki Khoj | Part-2 | Sant Shri Asharamji Bapu
हम संसार में नर्क देखते हैं या प्रभु देखते हैं यह हम पर आधार रखता है। ईश्वर में ना नर्क है ना स्वर्ग है। है प्रभु ही प्रभु इच्छा और द्वेष और उससे पैदा होने वाले द्वंद और मोह से हम लोग विमोहित हो जाते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं ... मोह सकल व्याधिन् कर मूला, ताते उपजे पुनी भव शूला। मोह सब व्याधियों का मूल है उससे फिर जन्म मरण का शूल पैदा होता है। हम अपनी इच्छा, अपना कुछ शूद्र व्यक्तित्व बनाकर उससे चिपके रहते हैं तब हम माया में बह जाते हैं। अगर हम उसकी हां में हां कर दे तो हम नहीं बचेंगे वो रह जायेगा। वह और हम फिर दो नहीं होते। हमारी जो आवश्यकताएं हैं जो नितांत जरूरी है वह पूरी करने में कोई परिश्रम नहीं है कोई पाप नहीं है लेकिन हम आवश्यकताओं में नखरे मिला देते हैं इच्छाएं मिला देते हैं और वह इच्छाएं पूरी होती है तो उन चीजों में राग होता है और पूरी नहीं होने पर द्वेष । हम शांति स्वरूप हैं लेकिन विपरीत इच्छाओं ने हमें परेशान कर दिया है। आवश्यकताएं परेशान नहीं करती इच्छाएं परेशान करती है। इच्छा द्वेष समुत्थेन्, द्वंद मोहेन् भारत। सर्व भूतानि सम्मोहम्, सर्गे यांती परंतपः।। जो इच्छाएं संसार के ...