ईश्वर की खोज | Ishwar ki Khoj | Part-1 | Sant Shri Asharamji Bapu सत्संग सार Satsang Summary
इच्छा द्वेष समुत्थेन, द्वंद मोहेन भारत। सर्व भूतानि सम्मोहम, सर्गे यांती परम तपः।।
हे भरतवंशी अर्जुन... संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख दुख आदि द्वंदरूप मोह से संपूर्ण प्राणी अत्यंत अग्यता को प्राप्त हो रहे हैं।
राग और द्वेष ना हो तो ईश्वर को पाने का कोई प्रयास, ईश्वर को खोजने का कोई प्रयास विशेष रूप से बचता नहीं है।
हम लोग प्राप्त परिस्थितियों का राग और द्वेष रहित अगर उपयोग करते हैं तो जीवन मुक्ति हमारी मुट्ठी में आ गई। साक्षात्कार हमारी मुट्ठी में आ गया।
हमारी बड़ी भारी गलती यह होती है कि जो भक्ति करते हैं उनको संसार से राग द्वेष हो जाता है और जो संसार में चिपके हैं उनको भक्ति से उपरामता आ हो जाती है। दोनों एक दूसरे के भाई हैं।
जहां राग द्वेष नहीं होता वहां लक्ष्मी जी का वास होता है।
हम नहीं चाहते फिर भी दुख आता है और वह रहता नहीं है। जब दुख नहीं चाहते फिर भी आता है तो सुख भी तो आयेगा और जायेगा।
जितना चित्त में राग और द्वेष कम होता है उतना वह स्वरूप अपना प्रत्यक्ष होता जाता है। तपस्या करने से, मौन रखने से, एकांत निवास करने से, जप और प्राणायाम करने से , अंतःकरण की शुद्धि होती है कुछ शक्तियां प्राप्त होती है। लेकिन माता या गुरुजनों की सेवा बहुत जल्दी ऊपर उठा देती है।
जितने अंश में हम इच्छा और द्वेष से बचते हैं उतने अंश में हम सत्य के करीब होते हैं।
मंत्र दीक्षा के समय यह शर्त होती है कि तन, मन और धन गुरु को अर्पण करना चाहिए। जिससे इच्छा, द्वंद और द्वेष पैदा होते हैं उन्हें गुरु को इमानदारी से अर्पण कर दो तो उसी समय ज्ञान हो जाये।
राजा जनक ने अष्टावक्र मुनि को तन मन धन अर्पण किया तो घोड़े के पेंगडे में पैर डालते डालते आत्मसाक्षात्कार हो गया
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