प्रातः संध्या सत्संग सार 17 May 2021

 Title - आत्मसाक्षात्कार Side-A 


पूज्य संत श्री आशारामजी बापू कहते हैं... 

  • जब तक मोह है तब तक जीव को बहुत कुछ करना पड़ता है। स्थूल शरीर में मोह होने से जगत के पदार्थों में आसक्ति होती हैं। सूक्ष्म शरीर में मोह होने से विचारों में आसक्ति होती है। यह मोह तब तक रहता है जब तक ज्ञान प्रगट नहीं हुआ अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ।
  • जिन जिन चीजों में मोह होता है देर सबेर वही कुटुंबी वही चीजें धोखा देती है और रुलाती है।
  • तपन, अशांति, दुख कोई नहीं चाहता लेकिन मजे की बात यह है कि जहां से तपन, अशांति, दुख पैदा होता है उन्हीं विषयों से सुख चाहता है। क्योंकि यह मोह की महिमा है। और यह मोह जब तक ज्ञान के द्वारा निवृत्त नहीं होता है तब तक अपने कंधे बदलता है।
  • व्यक्ति को अपनी समझ जब तक आती नहीं तब तक दिल की परेशानी जाती नहीं।
  • जीव खुद ही खुद का शत्रु है और खुद ही खुद का मित्र भी है।
  • हम जो नश्वर है उसकी नश्वरता सुनते हैं जो शाश्वत है उसकी शाश्वतता सुनते हैं। शाश्वत परमात्मा की प्रीति नहीं जगती है और नश्वर जगत का मोह नहीं छूटता है। इसीको सनातन धर्म के ऋषियों ने माया कहा है।
  • माया दो प्रकार की होती है। (1) संसार में खींचने वाली अविद्या (2) संसार से बाहर निकालने वाली ब्रह्मविद्या । अगर ब्रह्मविद्या की अर्चना, आराधना, उपासना की जाए तो ब्रह्मविद्या से बुद्धि का विकास होगा और यह आसुरी भाव मरेंगे।
  • आपके जीवन में दैवी शक्ति अगर पाना चाहते हो तो उपासना को अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए। बिना उपासना के बुद्धि का विकास भी नहीं होता है।
  • अपने मन में धीरज और संयम लाने के लिए दुर्गा सप्तशती और नवरात्र का उपयोग करके व्यक्ति उपवास और संयम करके राम जी के प्रसाद को पचाने की योग्यता लाता है। अपने मन पर लगाम लगाने के लिए दुर्गा सप्तशती के द्वारा इस उपासना के द्वारा अपने चित्त की शुद्धि उपलब्ध की जाती है।

आज प्रातः संध्या का सत्संग आप मंगलमय एप के द्वारा भी सुन सकते हैं। 


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