प्रातः संध्या सत्संग सार 19 May 2021
Title - परमात्मा का स्वरूप Side-B
पूज्य बापूजी कहते हैं...
- यदि बुलबुला अपने को पानी जान ले तो समझेगा की तरंगे भी सब मुझमें ही है। ऐसे ही जीव अपने ब्रह्मत्व को जान लें तो समझेगा कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी मुझ ही में है।
- ध्यान करेंगे तो जो संस्कार सुने हैं वह ध्यान में दृढ़ होंगे। कर्मकांड देह को मैं मानकर करोगे। तत्वज्ञान कुछ निराली चीज है। अपने ज्ञान स्वरूप में रहे तो खाने पीने के लिए मजदूरी, नौकरी नहीं करना पडेगी। उसके होने मात्र से ही प्रकृति में सब काम होते हैं।
- लाख आदमी में एक आदमी भी मैं चिदाकाश स्वरूप ब्रह्म हूं खाली ऐसा चिंतन करें और कोई धंधा ना करें तभी भी पृथ्वी स्वर्ग में बदल जाएगी।
- हम अपने को देह मानते हैं इसीलिए गुस्सा भी आता है, विकार भी आता है, दुख भी होता है। अपने को देह मानते रहोगे तब तक कोई ना कोई मुसीबत लगी रहेगी। बुद्धि दे हमें प्रतिष्ठित है इसलिए दुखी है। यदि बुद्धि परब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाए तो महान बन जाएगी।
- आत्म साक्षात्कार से सरल दुनिया मेंऔर कोई चीज नहीं है और आत्म साक्षात्कार जैसा कठिन विश्व में दूसरी कोई चीज नहीं है।
- जब तक ज्ञान नहीं हुआ तब तक ज्ञानी को ठीक से किसी ने देखा ही नहीं है। चाहे साथ में रहता हो, ज्ञानी की पत्नी हो, बेटा हो, शिष्य हो, शरीर से चिपका रहे फिर भी ज्ञानी को जान नहीं सकते। जिसको सुकृत बोध चाहिए पवित्र उपदेश चाहिए वह भगवान को निष्काम भाव से भजे, सेवा करें।
- हम हर रोज मंदिर में जाते हैं फिर भी मंदिर में नहीं है और ज्ञानी मंदिर में नहीं जाते फिर भी जहां पैर रखते हैं वहां मंदिर होता हैं। ज्ञान की चरण रज जहां है वह मंदिर - मस्जिद से कम नहीं होती।
- यह सारा जो खिलवाड़ है यह माया का है ज्ञानी को खुश करने के लिए बनाया है। प्रकृति जो कुछ भी लीला कर रही है वह ब्रह्म को खुश करने के लिए, ज्ञानी को रिझाने के लिए।
- जैसे प्रलय काल का समुद्र अपने में नही समाता वैसे ही ज्ञानी अपने में नहीं समाता। जब जीव भाव के संस्कार हटते हैं तो अपने पूर्व जीवन को देखकर ज्ञानी हंसता है।
- ज्ञान की चर्चा सुनने मात्र से जन्म जन्म की थकान मिट जाती है। ज्ञानी होना तो बात ही कुछ और है। ज्ञानी जिस जिस वस्तु को छूता है वह कालांतर में ज्ञान को उपलब्ध होकर उनकी मुक्ति हो जाती है। ज्ञानी के डंड करमंडल भी पवित्र हो जाता है तो मनुष्य की तो क्या बात है?
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