प्रातः संध्या सत्संग सार 20 May 2021

 Title - हे मेरे साधक Side-A



पूज्य बापूजी कहते हैं...


  • मौन के संकल्प कि अपेक्षा बोलने का संकल्प कम सामर्थ्य वाला होता है। मौन में बैठकर आत्मा में शांत होने की अपेक्षा बाहर के क्रियाकलाप छोटे हो जाते है।
  • जो सत्य स्वरूप परमात्मा तत्व का बोध दे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ स्व स्वरूप में जगे है उन पुरुषों की प्राप्ति अति कठिन है। ऐसे सद्गुरु मिलते हैं तो हमारा आमोल परिवर्तन हो जाता है। युगो का जो जन्म मरण का रोग है उसका निवारण करने के लिए वे परम गुरु भिन्न प्रकार की औषधि उपयोग करते है
  • साधक की जैसी प्रकृति होती है उस वक्त साधक को गुरु उसी प्रकार के भाषते हैं। हर साधक को अपने सद्गुरु प्रति अपने ढंग का आदर, मूल्य, अहोभाव अथवा लड़खड़ाती श्रद्धा आदि हुआ करते हैं।
  • जैसे चार पैसे का अनाज पाने के लिए के लिए किसान सब प्रकार की सावधानी रखता है वैसे ही है साधक तू भी विश्वनियता को पाने के लिए तू भी सावधान रहना भैया... जगत नियंता को पाने के लिए तू भी सावधान रहना। तू भी अपनी संयम की बाढ़ करना।
  • शिल्पी तो पत्थर में से मूर्ति बनाता है भगवान बनाता है लेकिन ऐसे ब्रह्मवेत्ता विरोध करने वाले, प्रतिक्रिया करने वाले मन बुद्धि के मनुष्य को ब्रह्म बनाते है। पत्थर से मूर्ति बनाना आसान है । लेकिन यह साधक तो घर भी भागेगा, सुकर्म में थोड़ा चलेगा तो कुकर्म में भी भागेगा चिंता में भी गिरेगा तो अहंकार की दौड़ भी करेगा और कभी कभी अपने गुरु के प्रति उसको कैसे-कैसे विचार उठेंगे और न जाने कैसे-कैसे खिसकने के तरीके खोजेगा। फिर भी गुरु मानव को महेश्वर रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
  • आपका जीवन कितना कीमती है वह ब्रह्मवेत्ता जानते हैं। और आप कितनी तुच्छ चीजों में गिर रहे हैं वह भी वे जानते हैं।
  • हे प्यारे साधक अगर आप अपने गुरु को खुश करना चाहते हो तो गुरु की आज्ञा मानो और गुरु की आज्ञा यही है कि गुरु जहां खेलते हैं तू वहां खेल खेलना शुरू कर दे। गुरु जहां गोता मारते हैं तो वहां पर गोता मार भैया... गुरु की जहां समझ है वहां तू अपनी वृत्ति को पहुंचाने का प्रयास कर।

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