प्रातः संध्या सत्संग सार 23 May 2021
Title- वास्तविक जीवन
पूज्य बापूजी कहते हैं...
- आदर्श भोक्ता वह है जिनके लिए भोग इंतजार करते हो और आदर्श कर्ता वही है जिनके लिए कर्म इंतजार करते हो हाथ जोड़कर खड़े हो। आदर्श दृष्टा वही है जिनके लिए दृश्य पलके बिछाकर खड़ा हो।
- हम इंद्रियों और मन से गलत काम लेते हैं इसलिए मन का प्रभाव हम पर पड़ जाता है। हमारी इच्छा ना होते हुए भी मन हमें नचाता रहता है। गलत काम हम सुख के लिए लेते हैं लेकिन सुख मिलता नहीं। यह बात समझ में आ जाए कि सुख प्रेमास्पद में है।
- जो मांगता है उसे अल्प मिलता है। जो मांगता नहीं है केवल प्यार से ही करता है तो प्रेमास्पद जानता है कि उसको किस वक्त किस चीज की जरूरत है, वह अपने आप सुरक्षा करता है अपने आप रखवाली करता है और अपने आप देता है।
- अगर शांति चाहिए तो वैराग्य और तत्वज्ञान का सहारा लो। अगर सामर्थ्य चाहिए तो इंद्रिय संयम करके योग, उपासना, धारणा ध्यान, समाधि करो। लेकिन अपने मैं को ईश्वर में अर्पित कर दिया जाए तो शांति और सामर्थ्य स्वाभाविक आ जाता है।
- विचार ऐसा करें कि विचार का अंत हो जाए और संबंध ऐसी जगह जोड़े कि सब जगह संबंध जोड़ने का अंत हो जाए। भीतर से संबंध जुड़ा रहेगा और मौत पकड़ कर ले जाएगी तो फिर किसी ना किसी के गर्भ में आकर लटकना पड़ेगा।
- लगाव के कारण हर जन्म में आदमी एक दूसरे से मिलता रहता है और कर्मों की लेनदेन करता रहता है। नये कर्म बनाता रहता है। फिर कभी पशु होकर ,कभी मनुष्य होकर लेन-देन करता है। ऐसे ही मजदूरी करने का अंत नहीं होता।
- कब मन संसार में रखना और कब हटाना यह समझ आ जाए तो तुम्हारे विचार का मूल्य है और यह समझ नहीं आई तो दोनों तरफ थप्पड़ ही तो खाते हो तुम। जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारा जीवन जीवन दाता के साथ मुलाकात करा दे। विचार ऐसा करो कि निर्विचार पद में प्रतिष्ठित करा दें।
- श्री योग वशिष्ठ में वशिष्ठजी कहते हैं.. हे रामजी... जिसने पुरुषार्थ का त्याग किया है वह नीच गति को प्राप्त हुए हैं और जिन्होंने पुरुषार्थ का अवलंबन लिया है वह महान हो गये।
आज प्रातः संध्या का सत्संग आप मंगलमय एप के द्वारा भी सुन सकते हैं।
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