प्रातः संध्या सत्संग सार 28 May 2021

 Title- चिदाकाश ज्ञान Side-A





पूज्य बापूजी कहते हैं...

  • दुख सुख वृत्तियों में होते हैं लेकिन हम लोग समझते हैं कि हम में होते हैं। तो हम हमको नहीं जानते। इसीलिए वृत्ति को सूक्ष्म करके वृत्ति को ही बाधित करना है। वृत्ति से निवृत होना है। दूसरे लाख उपाय करो आत्म लाभ नहीं होता।
  • यह ब्रह्मविद्या सत् पात्र शिष्य अथवा पुत्र के हृदय में ठहरती है। और पुत्र भी गुरु की नाइ सुने तब... पप्पा की नाइ सुने तो नहीं।
  • चित्त के विचारों को जो देख रहा है वह चिदाकाश है। उसको मैं रूप में मनन निदिध्यासन करें तो भ्रांति दूर हो गई। हो गए ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब कुछ हो गया।
  • मन बुद्धि चित्त अहंकार हम नहीं है। हम हैं चिदाकाश और चिदाकाश की सत्ता से यह प्रतीत होता है और बदलते हैं। मूर्खता से हम लोग प्रतीत होने वाले और बदलने वाले साधनों को मैं मान बैठते हैं और हम अबदल हैं। यह ज्ञान अगर बैठ जाए दिमाग में, चित्त में ठहर जाए तो यही है प्रसाद।
  • ऐसी कोई क्षण नहीं है जब तुम आकाश से अलग हो जाओ। ऐसी कोई जगह नहीं कि तुम आकाश से अलग हो जाओ। आकाश से तुम दूर नहीं जा सकते चाहे तुम कितने भी अच्छे बनो कितने भी बुरे बनो। जैसे आकाश तुम्हारा त्याग नहीं कर सकता। तुम आकाश का त्याग नहीं कर सकते। वैसे ही चिदानंद स्वरूप परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा त्याग नहीं कर सकता। तुम परमात्मा का त्याग नहीं कर सकते। जो दिख जाए वह माया है चाहे फिर किसी की भी देह हो लेकिन जिससे देखा जाता है और देखने वाला भी जिससे दिखता है वह है चिदाकाश परमात्मा
  • पहले ब्रह्म है फिर उसमें जगत दिखता है। यह जगत और शरीर बनते हैं टूटते हैं लेकिन अपना आत्मा अपना आपा अपने मूल स्वरूप को जाना तो जाना तो वही का वही रहता है।
  • जिसने सेवा किया है और जो सत् पात्र है उनके लिए यह ज्ञान अमानत रखा जाता है। यह ज्ञान ऋषिओ के हृदय में उड़ेला जाता है। साधकों के ह्रदय में उड़ेला जाता है। जैसे बुलबुला पानी रूप ही है ऐसे ही सब जीव भूत जात ब्रह्म में ही है। ब्रह्म रूप ही है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रातः संध्या सत्संग सार 22 June 2021

प्रातः संध्या सत्संग सार 31 May 2021

प्रातः संध्या सत्संग सार 26 May 2021