प्रातः संध्या सत्संग सार 29 May 2021

 Title- चिदाकाश ज्ञान Side-B




पूज्य बापूजी कहते हैं...

  • आलस्य से निष्ठा नहीं होगी। सत्कर्म करते हुए भी उसमें कर्तापने की भ्रांति से बचने में सावधानी होगी।
  • जिनकी खोपड़ी में जगत की सत्यता घुसी हुई है और कुछ बनना चाहते हैं, वेदांत विद्या कुछ बनने की विद्या नहीं है जानने की विद्या है।
  • अपने चित्त में जो फुरना उठता है उस फुरने से हम मिल जाते हैं इसीलिए साक्षात्कार नहीं होता। फुरने को देख ले तो फुरने के प्रभाव से बच जाएंगे।
  • चित्त में जो फुरना उठता है उसका प्रभाव तब तक रहेगा जब तक आप बेहोश रहे और फुरने में बहते गए।
  • भगवान शिवजी के इर्द-गिर्द रहने वाली सेविकाओं ने अपना प्रभाव दिखाने के लिए मां पार्वती को चुरा कर ले गई और चावल मैं उनको पका दिया और सब खा गई। शिवजी के नाराज होने पर सब ने वापस पार्वती बना दी और शिवजी से शादी करा दी।
  • जिस जगह पर बैठकर ब्रह्म परमात्मा का चिंतन होता है और जितना लंबे समय तक होता है उतनी ही जगह पावरफुल होती है। तीर्थ हो जाती है।
  • ब्रह्म परमात्मा सबका बाप है। तत्वज्ञान बहुत ऊंची चीज है। जहां तत्वज्ञान का चिंतन होता है वह भूमि तीर्थ है। वह शरीर देवालय है। सत्कर्म में बड़ी ताकत होती है। सेवा में बड़ी शक्ति है। उड़िया बाबा कहते हैं ध्यान समाधि करना आसान है लेकिन सेवा करना कठिन है।
  • सेवक तब तक ही सेवक है जब तक स्वामी का अनुगामी है। स्वामी के खिलाफ विचार आ गया तो सेवक उसी समय कट आउट हो जाएगा। 10 साल तक चलते रहे लेकिन अगर विपरीत विचार आ गया तो वहीं पहुंच जाएंगे जहां से चले थे।
  • आप जैसा सोचते हैं जैसा करते हैं घूम फिर कर आपके पास आ जाता है। क्योंकि एक ही सत्ता का विश्व है।
  • गुरु और शिष्य के बीच में अगर संघर्ष होता है तो शिष्य की नासमझी के कारण होता है

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