प्रातः संध्या सत्संग सार 30 May 2021

 Title- ज्ञान के नेत्र




पूज्य बापूजी कहते हैं...

  • जहां देखो वहां राम है जो सुमिरो सो राम है ऐसा समझ में आ जाए तो बेड़ा पार है लेकिन बुद्धि वाले को बुद्धि से समझ में आए तो हृदय कबूल नहीं करेगा। क्योंकि हृदय के त्रिदोष है मल, विक्षेप, आवरण यह कुछ ना कुछ बवाल करेंगे।
  • दो प्रकार के चैतन्य होते हैं। एक सामान्य चैतन्य दूसरा विशेष चैतन्य। वास्तव में दो प्रकार के चैतन्य होते नहीं है। यह मैं झूठ बोल रहा हूं क्योंकि झूठे समाज के बीच झूठ से ही सच का रास्ता निकलेगा।
  • यदि वेदांत के ग्रंथों में हिंदीभाषी ग्रंथ देखना हो तो विचार सागर पहले बना है।
  • सुबह की बुद्धि बड़ी सूक्ष्म, शांत और सात्विक होती है।
  • 200 वर्ष पहले के आदमी के पास अगर हम आते तो मुझे इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। 2000 वर्ष पहले महावीर, बुद्ध, कबीर, नानक आये उनको इतना परिश्रम नहीं करना पड़ा जितना आज के बुद्ध पुरुष को करना पड़ेगा। क्योंकि आज का मानव बड़ा बहिर्मुखी हो गया है।
  • हमारी कुछ ना कुछ योग्यता है, त्याग है, पुण्य है, सहयोग है इसलिए यह ज्ञान हम सुन पाते हैं। जब इतना पुण्य है, इतनी योग्यता है इस जन्म में फिर आगे चलने में क्या हरकत है। डरने की जरूरत नहीं है।
  • आंख सबको देखती है लेकिन अपने आप को नहीं देख पाती। वैसे ही परमात्मा हम लोगों के बहुत नजदीक है और आत्मज्ञान बहुत नजदीक है नितांत नजदीक है इसलिए दूर दिखता है क्योंकि हमारी इंद्रियों, मन, बुद्धि का प्रवाह बाहर हो गया है।
  • जहां जहां तुम्हारा मन और बुद्धि जाए वहां वहां नामरूप उसको माया समझ कर हटा दो। उसकी गहराई में जो है वह चैतन्य है।
  • आत्मवेताओं का सानिध्य जब इतना काम कर सकता है तो उस आत्मा देव को जिन्होंने जान लिया है, आत्मवेता जो हो गए उनकी कितनी है सुंदर अवस्था हुई होगी?
  • भगवान कहते हैं यदि तुम मेरे समग्र स्वरूप को नहीं जान सकते तो अपना मन और बुद्धि मुज साकार रूप में लगा दो।

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