प्रातः संध्या सत्संग सार 3 June 2021

 आत्म साक्षात्कार सरल है।



पूज्य बापूजी कहते हैं...
  • हमारी मान्यता ही हमको भगवान से दूर कर रही है। परमात्मा वह है जो सदा एक जैसा रहे और जो अदल बदल होता रहे वह उसकी माया है।
  • उल्टी मान्यता हटाने नाम ही साधना है। इधर-उधर जो तुम बिखर रहे हो उस बिखराव को थोड़ा थाम कर स्वीकार कर लो। चाहे 1 मिनट में कर लो। चाहे 1 साल में कर लो। 1000 जन्म में कर लो। करोड़ जन्म में करो बात इतनी ही है। महापुरुषों के अनुभव को सीधा साधा स्वीकर करके अपना अनुभव बनाने से बहुत लाभ होता है।
  • जिनको भीतर की यात्रा का स्वाद नहीं लेना अथवा अपनी गरिमा को नहीं जानते हैं उन्हीं का अंतःकरण अशुद्ध और अशुद्ध प्रवृत्ति होती है।
  • ऐसा कोई सद्गुण नहीं जो आत्म विचार से पैदा ना हो और ऐसा कोई दुर्गुणों नहीं जो भेदभाव ना से आए ना। सारे दुर्गुण भेद भावना से आते हैं और सारे सद्गुण अभेद भावना से पैदा होते हैं।
  • मान्यताएं हम लोगों को गिरा देती हैं।
  • जो आत्म विचार में स्थिति करता है उसका आचरण मंगलकारी हो जाता है, शुभ हो जाता है। दगा फटका आदि सब उससे अलविदा हो जाएंगे।
  • जो पापात्मा है उनको इन वचनों पर विश्वास भी नहीं आता और इन वचनों के अनुसार मौन भी नहीं होते। यह वचन सुनकर मौन हो जाना चाहिए शांत हो जाना चाहिए। गहरी अपनी गरिमा में खो जाना चाहिए।
  • सबके रोम रोम में मेरा ही चैतन्य आत्म राम रम रहा है। ॐ ॐ ॐ
  • इस चित्त के साक्षी चैतन्य स्वरूप मुझको मेरा प्रणाम है। पवित्र वातावरण में शुद्ध हृदय से बार-बार दोहराकर अपनी तुच्छ मानी हुई बातों को, पकड़ी हुई कल्पनाओं को छोड़ो तो अभी ही मुक्त हो। जो सर्वत्र है वह यहां भी है, जो सदा है वह अभी भी है, जो सब में है वह हमें भी हैं और जो सम है वह सब में एक जैसा ही है।
  • हम चिदाकाश स्वरूप निराकार स्वरूप चैतन्य आत्मा है ऐसा जो मानता है वही जानता है। बाकी के सब बालक हैं।

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