प्रातः संध्या सत्संग सार 6 June 2021

 Title- अष्टावक्र गीता

  • हम संसार में दुखी क्यों हैं? अथवा हम ईश्वर से दूर क्यों है? क्योंकि हम संयोगजन्य सुख चाहते हैं। हम सुख भविष्य में खोजते है। हमारा सुख कहीं और बरस रहा है। ऐसी गलती हम लोग करते हैं और हम संयोगजन्य सुख लेने की कोशिश करते हैं ।
  • आप जहां हो वहां अगर प्रसन्न नहीं हो तो बैकुंठ में भी प्रसन्नता मिलना संभव नहीं है। चित्त की वृत्तियां उठती है आसक्ति से, इच्छाओं से। चित्त रुपी सरोवर में वृत्तियां रुपी तरंगे उठती है।
  • हकीकत में किसी देश में कोई भगवान, किसी देश में कोई सुख है और हम वहां पहुंचे तभी सुखी होंगे ऐसा नहीं है। जो अभी आज इस समय सुखी नहीं हो सकता वह कल सुखी कैसे हो सकता है? जब भी आता है तो आज होकर आता है। कल कभी आती ही नहीं।
  • पृथ्वी का कोई ऐसा कोना नहीं, स्वर्ग का ऐसा कोई कोना नहीं, पाताल का कोई ऐसा कोना नहीं, तीनों भुवन में ऐसी कोई जगह नहीं कि आप देह को " मैं " मानकर पूर्ण रूप से संतुष्ट रह सके। कुछ ना कुछ फरियाद, प्रतिकूलता होगी।
  • हमारी जो चाहा है हमारी जो वासना है वह हमारे चित्त में बेचैनी पैदा कर देती हैं। वासना क्यों होती है? क्योंकि हम कुछ पाकर सुखी होने की गलती करते हैं।
  • कोई माला घुमाकर सुखी होने की इच्छा करें, कोई रुपया कमाकर, कोई कुछ पाकर ऐसा करते-करते जीवन समाप्त हो जाता है मौत आ जाती है। फिर दूसरा जीवन शुरू हो जाता है लेकिन मजदूरी से पिंड छूटता नहीं। अष्टावक्र जी कहते हैं कि ज्ञानी को समाधि करने की भी इच्छा नहीं होती।
  • अपना मूल स्वरूप और परमात्मा का मूल स्वरूप एक ही है। मेरा जो आत्मा मै रूप में है वह और परमात्मा एक जात के हैं।
  • ज्ञानवान उस असली स्वरूप में टिका है इसलिए उसकी सदा समाधि है। उसको समाधि करनी नहीं पड़ती उसका समाधान हो गया।
  • कुछ चाहिए तो गदाई है, कम चाहिए तो खुदाई है और कुछ नहीं चाहिए तो शहंशाही है। जब अपने असली आनंद स्वरूप का पता चला तो अंदर से चाह मिट गई।

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