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प्रातः संध्या सत्संग सार 22 June 2021

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  दिन में 20-25 बार अपने आप से मिलो। महीने 2 महीने में 1 दिन के लिए एकांत में चले जाओ। सप्ताह में एक-दो घंटे के लिए एकांत में चले जाओ। नदी किनारे चले जाओ। साल में एक दो महीना ऐसा एकांत में बिताओ की तुम्हारी खबर, पत्री, समाचार, चिट्ठी यह वह सब ना जाए  फिर देखो क्यों नहीं होता है? राजा राज छोड़ कर चले जाते थे तो आप साल भर में 1 महीना निकाल दोगे तो क्या घाटा हो जाएगा? माला में 108 दाने क्यों होते हैं? कोई भी बात को सौ बार दोहराते हैं तो असत्य भी सत्य होने लगता है मन को लगाम लगाने के लिए ऋषियो ने यह पद्धति खोज ली है। अपनी आत्मा में स्थिर होते होते मर जाना अच्छा है लेकिन प्रकृति में जीकर भी रहना बेकार है। श्री कृष्ण कहते हैं.. हे अर्जुन... जो अपने आप में भीतर संतुष्ट होता है जो मन और बुद्धि को भीतर विलय कर देता है ऐसा दृढ़ निश्चयी योगी मुझे प्यारा होता है। उसमे और मुझमे कदाचित फर्क नहीं है। तेरा दिल ही हरिद्वार है इसी हरिद्वार में गोते मारा कर। इसी हरिद्वार में तू शीतलता पाया कर, इसी हरिद्वार में तो आराम पाया कर, इस हरिद्वार में गोता मारने से पाप ताप हट जाते हैं। उस हरिद्वार में जा...

प्रातः संध्या सत्संग सार 6 June 2021

 Title- अष्टावक्र गीता हम संसार में दुखी क्यों हैं? अथवा हम ईश्वर से दूर क्यों है? क्योंकि हम संयोगजन्य सुख चाहते हैं। हम सुख भविष्य में खोजते है। हमारा सुख कहीं और बरस रहा है। ऐसी गलती हम लोग करते हैं और हम संयोगजन्य सुख लेने की कोशिश करते हैं । आप जहां हो वहां अगर प्रसन्न नहीं हो तो बैकुंठ में भी प्रसन्नता मिलना संभव नहीं है। चित्त की वृत्तियां उठती है आसक्ति से, इच्छाओं से। चित्त रुपी सरोवर में वृत्तियां रुपी तरंगे उठती है। हकीकत में किसी देश में कोई भगवान, किसी देश में कोई सुख है और हम वहां पहुंचे तभी सुखी होंगे ऐसा नहीं है। जो अभी आज इस समय सुखी नहीं हो सकता वह कल सुखी कैसे हो सकता है? जब भी आता है तो आज होकर आता है। कल कभी आती ही नहीं। पृथ्वी का कोई ऐसा कोना नहीं, स्वर्ग का ऐसा कोई कोना नहीं, पाताल का कोई ऐसा कोना नहीं, तीनों भुवन में ऐसी कोई जगह नहीं कि आप देह को " मैं " मानकर पूर्ण रूप से संतुष्ट रह सके। कुछ ना कुछ फरियाद, प्रतिकूलता होगी। हमारी जो चाहा है हमारी जो वासना है वह हमारे चित्त में बेचैनी पैदा कर देती हैं। वासना क्यों होती है? क्योंकि हम कुछ पाकर सुखी होन...

प्रातः संध्या सत्संग सार 5 June 2021

 Title- वेदांत की गरिमा पूज्य बापूजी कहते हैं... पानी में डूबने वाले व्यक्ति का तो पैसा और परिवार छूटता है लेकिन संसार में डूबने वाले का तो सर्वस्व छूट जाता है। हमारे दिल में ईश्वर है या जगत है? भोग है की भगवान है? उसको कभी- कभी देखना चाहिए गहराई से, एकांत में, ईमानदारी से। जो संसार तरफ सच्चाई से लगे हैं तो उनको वैराग्य होता है। यदि वैराग्य नहीं होता है तो समझो कि ईमानदारी से संसार का व्यवहार नहीं है। भोगो में चार दोष है- (1) वे सदा मिलते नहीं (2) इंद्रियों में उनको भोगने का बल सदा रहता नहीं (3) मन में उनकी रुचि सदा नहीं रहती (4) भोक्ता सदा नहीं रहता दो प्रकार के लोग होते हैं- (1) दूसरे के परिश्रम से भोग भोगना चाहते हैं (2) सच्चाई से ईमानदारी से भोग भोगना चाहते हैं। भोगी को हजार हजार भोग भोगने पर भी वह सुख नहीं मिलता जो सुख महापुरुषों के सानिध्य में बैठने मात्र से मिलता है जिसको इसी जन्म में संसार से पार होना हो उसको "ईश्वर की ओर" नाम की पुस्तक बार- बार पढ़नी चाहिए। यदि संसार से मन को उपराम करके भगवान में लगाना हो तो नहीं तो खतरा है। जिसको आत्म सुख चाहिए, जिसको अपना सौभाग्य ...

प्रातः संध्या सत्संग सार 4 June 2021

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 Title- अपने आपमें बैठो Side-B पूज्य बापूजी कहते हैं...  उदर की चिंता, प्रिय व्यक्ति की चर्चा, जिसका वियोग हो गया उसी की यादें यह सब वही तुम्हारी समाप्त हो जाएगी अगर तुम अपनी सीट पर आ जाते हो। हमको परिस्थितियां इसलिए कुचलती है क्योंकि हम अपनी सीट पर नहीं है। आप आत्मा में डट जाओ तो विपरीत से विपरीत परिस्थिति,  महान दुख की परिस्थिति आपको दुख नहीं दे सकेंगी। सुख में बदल जाएगी। जिसने तन मन को वश कर लिया वह तो भगवान हो गया और क्या? वह तो नारायण का अंग है। कमजोर विचार को शत्रु समझकर काट डालो। जो भी दुर्बल विचार आए उसे कुचल दो। दुर्बल विचार कभी सत्य नहीं हो सकते। घृणा के विचार आये उसी समय उसे उखेड़ दो। प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक दुनिया को निशंक हो कर देखें। उसके लिए हानि करने वाले के विचार बदल जाएंगे। कोई भी घटना घटी और दुख हो रहा है तो समझ लेना कि कचरा पेटी के निकट बैठे हैं। नजदीक नहीं कचरा पेटी में बैठे हैं। जब भी दुख हो, जब भी भय हो, जब भी चिंता हो तो यह बात तो पक्की है कि हम कचरा पेटी में बैठे हैं। अगर यह याद आ गया तो निकल आओगे। दुनिया की कोई भी चीज बिगड़ जाए तो हरकत नहीं...

प्रातः संध्या सत्संग सार 3 June 2021

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 आत्म साक्षात्कार सरल है। पूज्य बापूजी कहते हैं... हमारी मान्यता ही हमको भगवान से दूर कर रही है। परमात्मा वह है जो सदा एक जैसा रहे और जो अदल बदल होता रहे वह उसकी माया है। उल्टी मान्यता हटाने नाम ही साधना है। इधर-उधर जो तुम बिखर रहे हो उस बिखराव को थोड़ा थाम कर स्वीकार कर लो। चाहे 1 मिनट में कर लो। चाहे 1 साल में कर लो। 1000 जन्म में कर लो। करोड़ जन्म में करो बात इतनी ही है। महापुरुषों के अनुभव को सीधा साधा स्वीकर करके अपना अनुभव बनाने से बहुत लाभ होता है। जिनको भीतर की यात्रा का स्वाद नहीं लेना अथवा अपनी गरिमा को नहीं जानते हैं उन्हीं का अंतःकरण अशुद्ध और अशुद्ध प्रवृत्ति होती है। ऐसा कोई सद्गुण नहीं जो आत्म विचार से पैदा ना हो और ऐसा कोई दुर्गुणों नहीं जो भेदभाव ना से आए ना। सारे दुर्गुण भेद भावना से आते हैं और सारे सद्गुण अभेद भावना से पैदा होते हैं। मान्यताएं हम लोगों को गिरा देती हैं। जो आत्म विचार में स्थिति करता है उसका आचरण मंगलकारी हो जाता है, शुभ हो जाता है। दगा फटका आदि सब उससे अलविदा हो जाएंगे। जो पापात्मा है उनको इन वचनों पर विश्वास भी नहीं आता और इन वचनों के अनुसार मौन...