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प्रातः संध्या सत्संग सार 1 June 2021

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सूक्ष्म ज्ञान पूज्य बापूजी कहते हैं... चित्त के 2 भाव होते हैं- एक जगत भाव, दूसरा ब्रह्म भाव। जगत भाव से चित्त राग द्वेष को मैं मानता है और कर्म के बंधन में फंसता है। ब्रह्म भाव से चित्त ब्रह्म परमात्मा को पा लेता है। जो उत्तम प्रकार के साधक है उनकी वृत्ति गुरु कृपा से, साधन से, पुरुषार्थ से ब्रह्म की ओर फुरती है। 10 साल हरि ओम हरि ओम करो फिर भी यह ज्ञान तो पाना ही पड़ेगा। सर्वत्र अपना आपा ज्ञान के द्वारा समझ में आ जाए तो फिर वह चित्त जगत में होते हुए भी ब्रह्म बोध में चला जाएगा। सारी साधनाएं वहां पूरी हो गई। ब्रह्मबोध में जितनी प्रीति होती है, जितनी सावधानी होती है उतना ही जल्दी परमात्मा का अनुभव होता है। सारे पाप, सारे आकर्षण, सारी बुराइयां खत्म हो   जाती है। नहीं तो कुछ भी करो कुछ ना कुछ बुराई रहेगी। कुछ ना कुछ पाप रहेगा। कुछ ना कुछ आकर्षण रहेगा। कुछ ना कुछ विकर्षण रहेगा। ब्रह्मवेता महापुरुषों की मुख्य वृत्ति ब्रह्म परमात्मा में होती है और गौण वृत्ति से व्यवहार करते हैं। कभी कभार दोनों वृत्ति से भी व्यवहार करते हैं। जिसने केवल जगत की वृत्ति बनाई उसको भगवान की तरफ वृत...

प्रातः संध्या सत्संग सार 31 May 2021

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 Title  सूक्ष्म सत्य  SIDE - A पूज्य बापूजी कहते हैं... भक्ति मार्ग में दिनभर भगवदाकार वृत्ति बने इसलिए भिन्न-भिन्न पूजा का विधान कर दिया गया है। ताकि भक्तों की भगवदाकार भावना बन जाए। योग मार्ग में आसन आदि करके रजोगुण को हटाया जाए नहीं तो योग करते समय नींद आएगी। आसन से स्थूल निद्रा का त्याग और प्राणायाम से सूक्ष्म निद्रा पर विजय। योग मार्ग वालों के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रतिहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह 8 नियम होते हैं। सूर्योदय से 2:15 घंटे पहले साधक को उठ जाना चाहिए। और यह हरि की भक्ति में, ध्यान में बैठना चाहिए। जो लोग 4 बजे के बाद भी सोते रहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य में प्रॉब्लम होता है। वह निस्तेज हो जाएंगे। भक्ति मार्ग वालों को भी ध्यान तो करना ही पड़ता है। योग वालों को तो ध्यान करना ही करना है। मुख्य उसका ध्यान है। वेदांत वाले का मुख्य वेदांत है लेकिन ध्यान तो उसको भी जरूरी है। शबरी गुरु आश्रम में रही तो अध्यात्मिक रास्ते में कितनी महान बन गई। दूसरी कोई घर में रहकर इतनी भक्ति किया हो और महान बनी हो यह संभव नहीं है। हां संभव है सती अनुसूया महान थ...

प्रातः संध्या सत्संग सार 30 May 2021

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 Title- ज्ञान के नेत्र पूज्य बापूजी कहते हैं... जहां देखो वहां राम है जो सुमिरो सो राम है ऐसा समझ में आ जाए तो बेड़ा पार है लेकिन बुद्धि वाले को बुद्धि से समझ में आए तो हृदय कबूल नहीं करेगा। क्योंकि हृदय के त्रिदोष है मल, विक्षेप, आवरण यह कुछ ना कुछ बवाल करेंगे। दो प्रकार के चैतन्य होते हैं। एक सामान्य चैतन्य दूसरा विशेष चैतन्य। वास्तव में दो प्रकार के चैतन्य होते नहीं है। यह मैं झूठ बोल रहा हूं क्योंकि झूठे समाज के बीच झूठ से ही सच का रास्ता निकलेगा। यदि वेदांत के ग्रंथों में हिंदीभाषी ग्रंथ देखना हो तो विचार सागर पहले बना है। सुबह की बुद्धि बड़ी सूक्ष्म, शांत और सात्विक होती है। 200 वर्ष पहले के आदमी के पास अगर हम आते तो मुझे इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती।  2000 वर्ष पहले महावीर, बुद्ध, कबीर, नानक आये उनको इतना परिश्रम नहीं करना पड़ा जितना आज के बुद्ध पुरुष को करना पड़ेगा। क्योंकि आज का मानव बड़ा बहिर्मुखी हो गया है। हमारी कुछ ना कुछ योग्यता है, त्याग है, पुण्य है, सहयोग है इसलिए यह ज्ञान हम सुन पाते हैं। जब इतना पुण्य है, इतनी योग्यता है इस जन्म में फिर आगे चलने में क्या हरकत ...

प्रातः संध्या सत्संग सार 29 May 2021

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 Title- चिदाकाश ज्ञान Side-B पूज्य बापूजी कहते हैं... आलस्य से निष्ठा नहीं होगी। सत्कर्म करते हुए भी उसमें कर्तापने की भ्रांति से बचने में सावधानी होगी। जिनकी खोपड़ी में जगत की सत्यता घुसी हुई है और कुछ बनना चाहते हैं, वेदांत विद्या कुछ बनने की विद्या नहीं है जानने की विद्या है। अपने चित्त में जो फुरना उठता है उस फुरने से हम मिल जाते हैं इसीलिए साक्षात्कार नहीं होता। फुरने को देख ले तो फुरने के प्रभाव से बच जाएंगे। चित्त में जो फुरना उठता है उसका प्रभाव तब तक रहेगा जब तक आप बेहोश रहे और फुरने में बहते गए। भगवान शिवजी के इर्द-गिर्द रहने वाली सेविकाओं ने अपना प्रभाव दिखाने के लिए मां पार्वती को चुरा कर ले गई और चावल मैं उनको पका दिया और सब खा गई। शिवजी के नाराज होने पर सब ने वापस पार्वती बना दी और शिवजी से शादी करा दी। जिस जगह पर बैठकर ब्रह्म परमात्मा का चिंतन होता है और जितना लंबे समय तक होता है उतनी ही जगह पावरफुल होती है। तीर्थ हो जाती है। ब्रह्म परमात्मा सबका बाप है। तत्वज्ञान बहुत ऊंची चीज है। जहां तत्वज्ञान का चिंतन होता है वह  भूमि तीर्थ है। वह शरीर देवालय है। सत्कर्म में...

प्रातः संध्या सत्संग सार 28 May 2021

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 Title- चिदाकाश ज्ञान Side-A पूज्य बापूजी कहते हैं... दुख सुख वृत्तियों में होते हैं लेकिन हम लोग समझते हैं कि हम में होते हैं। तो हम हमको नहीं जानते। इसीलिए वृत्ति को सूक्ष्म करके वृत्ति को ही बाधित करना है। वृत्ति से निवृत होना है। दूसरे लाख उपाय करो आत्म लाभ नहीं होता। यह ब्रह्मविद्या सत् पात्र शिष्य अथवा पुत्र के हृदय में ठहरती है। और पुत्र भी गुरु की नाइ सुने तब... पप्पा की नाइ सुने तो नहीं। चित्त के विचारों को जो देख रहा है वह चिदाकाश है। उसको मैं रूप में मनन निदिध्यासन करें तो भ्रांति दूर हो गई। हो गए ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब कुछ हो गया। मन बुद्धि चित्त अहंकार हम नहीं है। हम हैं चिदाकाश और चिदाकाश की सत्ता से यह प्रतीत होता है और बदलते हैं। मूर्खता से हम लोग प्रतीत होने वाले और बदलने वाले साधनों को मैं मान बैठते हैं और हम अबदल हैं। यह ज्ञान अगर बैठ जाए दिमाग में, चित्त में ठहर जाए तो यही है प्रसाद। ऐसी कोई क्षण नहीं है जब तुम आकाश से अलग हो जाओ। ऐसी कोई जगह नहीं कि तुम आकाश से अलग हो जाओ। आकाश से तुम दूर नहीं जा सकते चाहे तुम कितने भी अच्छे बनो कितने भी बुरे बनो। जैसे आकाश ...

प्रातः संध्या सत्संग सार 27 May 2021

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  Title - जड़ चेतन ब्रह्म का अर्थ स्वरूप  ॐ तुम्हारे आत्मा में अथाह शक्ति है। मन जैसा बार-बार चिंतन करता है वैसा रूप ले आता है। अनेक में एक का दर्शन ज्ञान मार्ग वालों का यह ध्यान है। मैं एक का एक हूं ऐसा पक्का ध्यान करने से बाकी का अनेक होते हुए भी एक में मन ठहर जाएगा। यथार्थ तत्ववेत्ता नहीं मिलते तब तक धर्म के नाम पर आदमी कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है। जब ज्ञानी मिल जाते हैं तब बस... जिसमे सहनशक्ति नहीं है ज्ञान की धारणा नहीं है वह धनवान होते हुए भी गरीब है, पढ़ा हुआ भी मूर्ख है और धार्मिक होते हुए भी नास्तिक है। संसार में उथल-पुथल होती रहती है लेकिन ज्ञान में समझ की शक्ति है धैर्य है कि आखिर यह भी गुजर जाएगा। यह भी नहीं रहेगा यह भी गुजर जाएगा आखिर यह भी कब तक? इतना यदि याद हो जाए तो बड़ी मदद करता है और फिर चित्त एकाग्र हो जाता है। ओंकार की और परमात्मा के नाम की अलग अलग ढंग से शास्त्रों में व्याख्या है। किसी भी मंत्र का जप करते हुए यदि उसमें ओमकार मंत्र नहीं है तो वह मंत्र अधूरा है। आत्मज्ञान नहीं करा सकेगा। ओम परमात्मा का शुरुआती नाम है। हमारा तुम्हारा तब हो...

प्रातः संध्या सत्संग सार 26 May 2021

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Title - विवेक दर्पण जिनको वृद्धा अवस्था दिखती है, जिनको मौत दिखती है, जिनको गर्भवास का दुख दिखता है, जिनको संसार की नश्वरता दिखती है, जिनको यह संबंध स्वप्नवत दिखते हैं ऐसे जो साधक है वह मोह में, आडंबर में ना पडकर, विलास में और दिखावे में न पडकर वह परमात्मा की गहराई में जाने की कोशिश करते हैं।   जो कर्म करने से चित्त परमात्मा से विमुख हो सच्चा जिज्ञासु सच्चा भक्त वह कर्म नहीं करता। जिस मित्रता से भगवतप्राप्ति ना हो उस मित्रता को शूली की शैया समझता है ईश्वर के लिए जगत छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन जगत के लिए ईश्वर को कभी मत छोड़ना। परमात्मा के लिए मित्र छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन मित्र के लिए परमात्मा को न छोड़ना। ईश्वर के लिए प्रतिष्ठा छोड़नी पड़े तो छोड़ देना लेकिन प्रतिष्ठा के लिए ईश्वर को मत छोड़ना। स्वास्थ्य और सौंदर्य परमात्मा के लिए छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन स्वास्थ्य और सौंदर्य के लिए परमात्मा को ना छोड़ना। सत्य और परमात्मा का बलिदान देकर जो कुछ भी पाया है वह सब तुमने अपने साथ जुल्म किया है। ईश्वर को छोड़कर जो तुम कहीं अपना दिल लगा रहे हो तो तुम अपने साथ शत्रुता कर ...

प्रातः संध्या सत्संग सार 25 May 2021

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Title - अपने आप में बैठो  आप सांकेतिक भाषा समझे या विस्तार से समझे लेकिन बात यह समझनी है कि मनुष्य जन्म कीमती है उसकी एक-एक क्षण का सदुपयोग करो।   अच्छे में अच्छी जगह वह मानी जाती है जहां परमात्मा बसता है। परमात्मा रहते कहां है?  सामान्य रूप से परमात्मा सब जगह रहते हैं लेकिन विशेष रूप से प्रकट होते हैं हृदय में। वेदांत जैसा और कोई सरल ज्ञान नहीं है लेकिन हमारा उल्टे ज्ञान का अभ्यास इतना पक्का हो गया है सुलटा ज्ञान कठिन लग रहा है और उल्टा आसान। आत्मा परमात्मा को जानकर परमात्मा में एक हो जाना बड़ा सरल है यह अत्यंत सरल बात कठिन लग रही है। इसको जान लिया तो बस... 33 करोड़ देवता तो भोगो के पीछे गए तुम भोगो से पृथक भोगो के साक्षी भोगो के बाप बन गए। दुख और सुख का  जो स्वामी बनेगा उसका दुख क्या कर सकेगा? सुख-दुख जो भी आता है उसे पसार होने दो अपने आप को उससे  चिपकाओ मत। हम लोग अपने को सुख दुख में चिपका देते हैं इसीलिए अत्यंत सुलभ जो परमात्मा शांति है वह कठिन हो गई। विषयों की इच्छा हमसे चापलूसी कराती हैं और परमात्मा का ज्ञान हमारे द्वारा प्रेम प्रकट करवा देता ह...

प्रातः संध्या सत्संग सार 24 May 2021

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Title- वास्तविक जीवन भाग 2 पूज्य बापूजी कहते हैं... संसार की विद्या पढ़ने के बाद उसको याद रखना पड़ता है और याद ना करो तो कम हो जाती है भूल जाते हैं। धन कमाने के बाद उसे ब्याज पर रखा जाता है तो बढ़ता है और कोई खतरे वाली पार्टी में रखो तो ब्याज सहित धन गायब हो जाता है। लेकिन यह ब्रह्मविद्या का धन ऐसा है कि उसकी स्मृति करो चाहे ना करो यह आत्मज्ञान एक बार आ गया फिर अपने आप बढ़ता जाता है। मन की वासनाए तब तक नहीं मिटती जब तक हम ईश्वर या गुरु के ज्ञान में अपने अहम को अर्पित नहीं करते। जिसका मन विषयों में बंधा है, जीव भाव में बंधा है, मत पंथ और संप्रदाय की बातों में बंधा है, मेरे तेरे में बंधा है ऐसे व्यक्तियों के संग में हम निर्बंध नहीं होते। जिनका मन विषय विकारों को बाधित करके अपने आत्मा में विश्रांति पाया है निर्बंध तत्व का जिन महापुरुषों ने साक्षात्कार किया है ऐसे महापुरुषों की एक मुलाकात भी जीवन की तमाम उलझनों को पार कर देती है और नया सूर्य उदय हो जाता है। यह ब्रह्मविद्या पचवाने के लिए गुरुओं को क्या-क्या करना पड़ता है? कहां-कहां की कहानियां, दृष्टांत, घटनाएं लाते हैं ताकि शाय...

प्रातः संध्या सत्संग सार 23 May 2021

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 Title- वास्तविक जीवन पूज्य बापूजी कहते हैं... आदर्श भोक्ता वह है जिनके लिए भोग इंतजार करते हो और आदर्श कर्ता वही है जिनके लिए कर्म इंतजार करते हो हाथ जोड़कर खड़े हो। आदर्श दृष्टा वही है जिनके लिए दृश्य पलके बिछाकर खड़ा हो। हम इंद्रियों और मन से गलत काम लेते हैं इसलिए मन का प्रभाव हम पर पड़ जाता है। हमारी इच्छा ना होते हुए भी मन हमें नचाता रहता है। गलत काम हम सुख के लिए लेते हैं लेकिन सुख मिलता नहीं। यह बात समझ में आ जाए कि सुख प्रेमास्पद में है। जो मांगता है उसे अल्प मिलता है। जो मांगता नहीं है केवल प्यार से ही करता है तो प्रेमास्पद जानता है कि उसको किस वक्त किस चीज की जरूरत है, वह अपने आप सुरक्षा करता है अपने आप रखवाली करता है और अपने आप देता है। अगर शांति चाहिए तो वैराग्य और तत्वज्ञान का सहारा लो। अगर सामर्थ्य चाहिए तो इंद्रिय संयम करके योग, उपासना, धारणा ध्यान, समाधि करो। लेकिन अपने मैं को ईश्वर में अर्पित कर दिया जाए तो शांति और सामर्थ्य स्वाभाविक आ जाता है। विचार ऐसा करें कि विचार का अंत हो जाए और संबंध ऐसी जगह जोड़े कि सब जगह संबंध जोड़ने का अंत हो जाए। भीतर से स...

प्रातः संध्या सत्संग सार 22 May 2021

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 Title- हो जा अजर हो जा अमर पूज्य बापूजी कहते हैं... जिज्ञासु दो प्रकार के होते हैं...(1) कृत उपासक (2) अकृत उपासक शरीर में पित्त और कफ अधिक है तो आदमी मोहित होता है। वात अधिक है तो काम ही हो सकता है। आकाश तत्व ज्यादा है तो कामी और क्रोधी हो सकता है। जैसे कपडे से रुई निकाल दो तो कपड़ा नहीं बचता वैसे ही शरीर से पंचभूत निकाल दो तो शरीर नहीं बचेगा। फिर भी मैं बचता हूं। माला करना, जप-तप करना यह आवांतर साधन है। लेकिन प्रत्यक्ष साधन तो आत्मज्ञान है। वह ईश्वर जब जब सुनता है तो वह तुम्हारी अंतर्मुखता से ही सुनता है। जब जब आता है तो तुम्हारे दिल के द्वारा ही आता है। अहंकार कभी तो मित्रों को मेरा मान कर गर्व लेता है। कभी विद्या को मेरा मानकर गर्व लेता है। कभी मकान को मेरा मानकर गर्व लेता है। कभी बैंक के पैसे को मेरा मानकर गर्व लेता है। अष्टावक्र जी ने माता के गर्भ से ही घोषणा कर दी कि मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं, मैं अजन्मा हूं, मैं निर्विकार हूं, मैं चैतन्य हूं। मदालसा के पुत्रों को मदालसा ने पयपान कराते हुए ही घोषणा कर दी और हम 40- 40 साल के बैल हो गए 30-30 साल के हो गए 50 50 साल के हो गए...